हिंदी दिवस पर विशेष लेख, हजारीबाग की हिंदी पत्रकारिता:कलम से लोकचेतना तक प्रस्तुति: ✍️ रंजन चौधरी,सांसद मीडिया प्रतिनिधि, हजारीबाग लोकसभा ...
हिंदी दिवस पर विशेष लेख, हजारीबाग की हिंदी पत्रकारिता:कलम से लोकचेतना तक
प्रस्तुति: ✍️ रंजन चौधरी,सांसद मीडिया प्रतिनिधि, हजारीबाग लोकसभा क्षेत्र।
हजारीबाग/अशोक बंटी राज
भारत की आजादी से पहले देश की पवित्र भूमि विदेशी शासन के अधीन थी। शासन-प्रशासन से लेकर न्यायालय, विश्वविद्यालय और सरकारी कार्यालयों तक अंग्रेजी का वर्चस्व था। अंग्रेजी पढ़ना, बोलना और लिखना उस दौर में सामाजिक प्रतिष्ठा और सरकारी नौकरी की योग्यता का प्रतीक माना जाता था। भारतीय भाषाओं में लिखे आवेदन और अभिव्यक्तियां अक्सर उपेक्षा का शिकार होती थीं। अंग्रेजी शासन की भाषा ही नहीं, बल्कि सत्ता और प्रभाव की भाषा बन चुकी थी।
फिर इतिहास ने करवट ली। भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों और असंख्य साधकों का संघर्ष रंग लाया और 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ। स्वतंत्रता के साथ देश के सामने केवल सत्ता हस्तांतरण का प्रश्न नहीं था बल्कि अपनी पहचान, अपनी भाषा और अपनी सांस्कृतिक चेतना को पुनर्स्थापित करने की चुनौती भी थी। संविधान निर्माण के दौरान भाषा का प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण विषय बनकर सामने आया। अंततः संविधान के अनुच्छेद 343 के तहत देवनागरी लिपि में हिंदी को संघ की राजभाषा स्वीकार किया गया। यह निर्णय भारतीय भाषाई अस्मिता और लोकतांत्रिक चेतना के लिए महत्वपूर्ण पड़ाव था। हिंदी का विस्तार सिर्फ सरकारी कामकाज तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने देश के विभिन्न हिस्सों के लोगों को जोड़ने वाली संपर्क भाषा के रूप में भी अपनी मजबूत पहचान बनाई।
हिंदी की शक्ति उसकी व्यापकता और सहजता में है। भारत के अलग-अलग अंचलों की भाषाओं और बोलियों से शब्द ग्रहण कर हिंदी निरंतर समृद्ध हुई है। हिंदी को मजबूत बनाने का अर्थ यह नहीं था कि दूसरी भारतीय भाषाओं को पीछे करना है, बल्कि देश की सभी भाषाओं और बोलियों के प्रति उदारता रखते हुए हिंदी को लोकभाषाओं की ऊर्जा से समृद्ध करना है और जब हिंदी की इसी यात्रा की बात होती है तो हजारीबाग की धरती को कैसे भुलाया जा सकता है?
प्रस्तुति: ✍️ रंजन चौधरी,सांसद मीडिया प्रतिनिधि, हजारीबाग लोकसभा क्षेत्र।
हजारीबाग का इतिहास प्राकृतिक सौंदर्य, राजनीतिक घटनाओं और सामाजिक आंदोलनों का इतिहास तक ही सीमित नहीं है। यह कलम, विचार और जनचेतना की भी धरती रही है। यहां की पत्रकारिता ने समय-समय पर सत्ता से सवाल पूछे, समाज की पीड़ा को शब्द दिए और ग्रामीण अंचलों की आवाज को व्यापक मंच तक पहुंचाया। स्वतंत्रता के बाद हजारीबाग और तत्कालीन छोटानागपुर क्षेत्र में हिंदी पत्रकारिता ने धीरे-धीरे अपनी मजबूत जमीन तैयार की। यह वह समय था जब संसाधन सीमित थे, तकनीक आज जैसी आसान नहीं थी और पत्रकारिता आर्थिक रूप से भी चुनौतीपूर्ण पेशा थी। फिर भी कुछ जुनूनी पत्रकारों और संपादकों ने समाचार पत्र निकालने का साहस किया। रामगढ़ राज के राजा कामाख्या नारायण सिंह का राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव इस पूरे क्षेत्र में व्यापक था। स्वतंत्रता के बाद उन्होंने क्षेत्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1946 में छोटानागपुर-संताल परगना जनता पार्टी के गठन के माध्यम से उन्होंने कांग्रेस के सामने एक प्रभावशाली राजनीतिक विकल्प खड़ा किया। बाद के वर्षों में इस राजनीतिक धारा का प्रभाव इतना व्यापक हुआ कि 1957 के विधानसभा चुनाव में हजारीबाग की सभी 16 विधानसभा सीटों पर इस दल के उम्मीदवारों की जीत का उल्लेख मिलता है। इस राजनीतिक इतिहास के साथ-साथ क्षेत्र की पत्रकारिता ने भी जनमत निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हजारीबाग की धरती ने राजनीति को केवल नेताओं के माध्यम से नहीं, बल्कि कलम के माध्यम से भी प्रभावित किया। हजारीबाग की हिंदी पत्रकारिता के पुराने अध्यायों में स्वर्गीय अजय सिंह के संपादन में ‘छोटानागपुर वाणी’ और स्व. ब्रजमोहन जी उर्फ ‘वक्राक्ष’ के संपादन में ‘मयूरपंख’ जैसे प्रकाशनों का उल्लेख महत्वपूर्ण है। ‘वक्राक्ष’ नाम से लिखने वाले ब्रजमोहन जी की लेखनी अपने व्यंग्यात्मक तेवर और निर्भीक अभिव्यक्ति के लिए जानी जाती थी। हजारीबाग की पत्रकारिता में ऐसी लेखनी ने समाचार को सूचना तक सीमित नहीं रखा बल्कि उसे सामाजिक हस्तक्षेप का माध्यम बनाया। इसी परंपरा में प्रमिला गुप्ता के संपादन में ‘समाधान सामंजस्य’ और अरविंद ओझा के संपादन में ‘भिन्सरा संवाद’ जैसे साप्ताहिक प्रकाशनों ने भी अपनी भूमिका निभाई। समय के साथ इनमें से कई प्रकाशन बंद हो गए, लेकिन उन्होंने स्थानीय पत्रकारिता के विकास में जो योगदान दिया, वह इतिहास का हिस्सा है। हजारीबाग के वरिष्ठ पत्रकार स्वर्गीय गौड़ चक्रवर्ती, स्वर्गीय देव कुमार सेन, स्वर्गीय राजेंद्र राणा और स्वर्गीय बद्री प्रसाद जैसे पत्रकारों ने अपनी निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता से स्थानीय मुद्दों को राष्ट्रीय फलक तक पहुंचाया। इन पत्रकारों की पीढ़ी ने यह साबित किया कि पत्रकारिता का मूल्य अखबार के आकार नहीं बल्कि कलम की विश्वसनीयता और साहस से तय होता है। हजारीबाग की पत्रकारिता के इतिहास में ‘हजारीबाग टाइम्स’ और ‘रजरप्पा टाइम्स’ का अध्याय विशेष महत्व रखता है। 15 अगस्त 1989 को ‘हजारीबाग टाइम्स’ का प्रकाशन शुरू हुआ। वहीं 19 नवंबर 1985 को ‘रजरप्पा टाइम्स’ की शुरुआत हुई। इन दोनों साप्ताहिक अखबारों ने उस दौर में ग्रामीण और आंचलिक पत्रकारिता को मजबूत आधार दिया, जब बड़े मीडिया संस्थानों की पहुंच आज जैसी व्यापक नहीं थी। ‘हजारीबाग टाइम्स’ के संपादन से प्रो. डॉ. सुबोध सिंह शिवगीत और ‘रजरप्पा टाइम्स’ से सहदेव प्रसाद लोहानी का नाम जुड़ा रहा। इन दोनों प्रकाशनों ने जिला मुख्यालय से आगे बढ़कर ग्रामीण क्षेत्रों में संवाददाताओं और पत्रकारों की एक नई पीढ़ी तैयार की। वह पत्रकारिता का ऐसा दौर था जब अखबार निकालना आज की तरह आसान नहीं था। तस्वीरें नियमित रूप से प्रकाशित नहीं होती थीं। खबर भेजने के लिए आधुनिक डिजिटल माध्यम नहीं थे। फिर भी पाठक पूरे सप्ताह अगले अंक की प्रतीक्षा करते थे। अखबार केवल कागज नहीं था, वह इंतजार था। खबर केवल सूचना नहीं थी, वह भरोसा थी और पत्रकार केवल संवाददाता नहीं था, वह समाज की आंख और आवाज था। हजारीबाग के पुराने समाहरणालय परिसर का विशाल बरगद का पेड़ कभी स्थानीय राजनीति और सार्वजनिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र हुआ करता था। वहीं से पत्रकारों को कई खबरों के सूत्र मिलते थे। आज की तरह मोबाइल फोन, इंटरनेट और सोशल मीडिया नहीं थे। पत्रकारों को घटनास्थल तक जाना पड़ता था, लोगों से मिलना पड़ता था और खबर की पुष्टि के लिए कई स्तरों पर मेहनत करनी पड़ती थी। रांची से प्रकाशित होने वाले ‘रांची एक्सप्रेस’ जैसे प्रमुख अखबारों में भी हजारीबाग की पत्रकारिता से जुड़े नाम अपनी पहचान बना रहे थे। ब्रजमोहन जी उर्फ वक्राक्ष और सांवरमल अग्रवाल के कॉलम अपने व्यंग्यात्मक तेवर और निर्भीक अभिव्यक्ति के लिए चर्चित रहे। पाठक उनके कॉलम का इंतजार करते थे। यह वह पत्रकारिता थी जिसमें शब्दों में धार थी और संपादकीय स्वतंत्रता का अपना महत्व था। ‘हजारीबाग टाइम्स’ ने अपने दौर में स्थानीय मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा के संसदीय क्षेत्र में खुलेआम कोयला तस्करी से संबंधित खबरों की श्रृंखला ने व्यापक चर्चा पैदा की। जुलजुल में बौद्ध साइट, ईसाई मिशनरियों से जुड़े धर्मांतरण के आरोप, क्षेत्र उग्रवादी हिंसा, कोयला तस्करी और सामाजिक कुरीतियों जैसे मुद्दों पर भी अखबार ने अभियान चलाए। उस दौर में खबर लिखना केवल पेशेवर जिम्मेदारी नहीं था, कई बार यह व्यक्तिगत जोखिम उठाने जैसा था। ऐसी पत्रकारिता की कीमत संपादकों और पत्रकारों को विभिन्न रूपों में चुकानी पड़ी। ‘भोलूआ की चिट्ठी’, ‘किसी से कहिएगा मत’ और ‘हजारीबाग हिजड़ों का शहर क्यों?’ जैसे हजारीबाग टाइम्स के विशेष कॉलम पाठकों के बीच चर्चा का विषय बने। ‘हजारीबाग टाइम्स’ का प्रकाशन वर्ष 2010 में बंद हो गया, लेकिन उसने जिन पत्रकारों को मंच दिया, उनकी पत्रकारिता यात्रा आगे बढ़ती रही। वही दूसरी ओर ‘रजरप्पा टाइम्स’ ने भी अपनी निर्भीक और जनसरोकार वाली पत्रकारिता से अलग पहचान बनाई। बीएसएनएल तथा एक बड़ी स्वयंसेवी संस्था से जुड़े कथित भ्रष्टाचार के मामलों पर प्रकाशित खबरों ने व्यापक प्रतिक्रिया पैदा की। विरोध हुआ, अखबार की प्रतियां जलाने और जुलूस निकालने जैसी घटनाएं भी सामने आईं। ‘खबर कूड़े के ढेर में अपना हजारीबाग’ और बरही के विधायक मनोज यादव अपराधियों के निशाने पर...संबंधित खबरों ने पाठकों का ध्यान आकर्षित किया और इनके प्रभाव की चर्चा हुई। रजरप्पा टाइम्स का संपादकीय आज भी उस दौर की पत्रकारिता की याद दिलाता है, जब खबरों के साथ समझौता न करने को पत्रकारिता का मूल धर्म माना जाता था।
प्रस्तुति:- रंजन चौधरी,सांसद मीडिया प्रतिनिधि, हजारीबाग लोकसभा क्षेत्र।
‘हजारीबाग टाइम्स’ से जुड़े रहे स्वर्गीय त्रिपुरारी सिंह उर्फ टीपी सिंह, स्वर्गीय प्रो. शैलेश शर्मा, स्वर्गीय राजीव रंजन, सुरेंद्र नाथ मिश्रा, उमेश प्रताप, मो. सलाउद्दीन, उमेश राणा, उमेश कुमार, जफरूल्ला सादिक, परवेज आलम, मोहनीश कुमार, विकास रंजन मिश्रा, अजय शर्मा, सुरजीत सिंह, प्रो. प्रमोद सिंह, मिथिलेश सिंह, प्रो. गजेंद्र सिंह और मुरारी सिंह सहित अनेक पत्रकारों ने अपनी पत्रकारिता यात्रा को आगे बढ़ाया। इसी प्रकार ‘रजरप्पा टाइम्स’ से जुड़े पार्थिव कुमार, अशोक राणा, यमुना राम कुंदन, अनुज कुमार सिन्हा, शंभूनाथ चौधरी, अजय शर्मा, उदय चंद सिन्हा, स्वर्गीय प्रल्हाद शर्मा, स्वर्गीय प्रमोद कुमार, गोपाल पांडेय, मीरा शर्मा और सत्येंद्र सिंह सहित अनेक पत्रकारों ने पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई। इन नामों की लंबी सूची इस बात की गवाही देती है कि स्थानीय साप्ताहिक अखबार केवल समाचार प्रकाशित नहीं कर रहे थे, बल्कि पत्रकार तैयार कर रहे थे।इन स्थानीय अखबारों की लोकप्रियता और पाठकों के बीच उनकी पकड़ ने 1990 के दशक में बड़े दैनिक समाचार पत्रों के लिए भी जमीन तैयार की। धीरे-धीरे बड़े मीडिया समूह हजारीबाग पहुंचे और उनके कार्यालय खुलने लगे। दिलचस्प बात यह रही कि इन बड़े संस्थानों में काम करने वाली पत्रकारों की नई पीढ़ी का एक हिस्सा स्थानीय साप्ताहिक अखबारों की पाठशाला से होकर निकला था। यानी बड़े अखबारों ने हजारीबाग में पत्रकारिता शुरू नहीं की थी। उन्होंने उस जमीन पर अपना विस्तार किया जिसे स्थानीय पत्रकारिता पहले से तैयार कर चुकी थी।
हजारीबाग की पत्रकारिता ने तकनीक के कई युग देखे हैं।
एक दौर था जब बसों से स्वलिखित खबरें भेजी जाती थी। फिर फैक्स से खबर भेजी जाती थी और बस से तस्वीरें भेजी जाती थीं। फिर खबर कंप्यूटर से टाइप कर भेजने और तस्वीर स्कैन कर भेजने का दौर आया। इसके बाद ई-मेल, मोबाइल इंटरनेट, सोशल मीडिया और डिजिटल पोर्टल आए। आज हजारीबाग से प्रातः आवाज नामक दैनिक अखबार का प्रकाशन और प्रिंटिंग संपादक नीलेन्दु जयपुरियर के संपादन में रहा है वही एक दर्जन के करीब पीडीएफ अखबार का प्रकाशन हो रहा है।
आज पत्रकारिता एआई के दौर में प्रवेश कर चुकी है।
पहले खबर के लिए पत्रकार को घटनास्थल तक जाना पड़ता था। आज मोबाइल फोन जेब में पूरा न्यूज़रूम लेकर चलता है। पहले खबर अगले अंक में आती थी, आज घटनाक्रम के साथ-साथ अपडेट हो जाती है। पहले पाठक अखबार का इंतजार करता था, आज समाचार उसके मोबाइल की स्क्रीन पर स्वयं पहुंच जाता है। लेकिन तकनीक बदली है, पत्रकारिता का मूल धर्म नहीं। सत्य की तलाश, तथ्य की पुष्टि और जनहित के प्रति प्रतिबद्धता आज भी पत्रकारिता की असली कसौटी यही है। डिजिटल क्रांति ने पत्रकारिता को लोकतांत्रिक बनाया है। अब समाचार प्रकाशित करने के लिए बड़े प्रेस और भारी पूंजी की अनिवार्यता नहीं रही। एक मोबाइल फोन और इंटरनेट कनेक्शन से कोई भी व्यक्ति अपनी बात लाखों लोगों तक पहुंचा सकता है। लेकिन इसी के साथ फेक न्यूज, भ्रामक सूचनाओं, अधूरी खबरों और पीत पत्रकारिता की चुनौती भी बढ़ी है। पोर्टल, डिजिटल अखबार, यूट्यूब चैनल और सोशल मीडिया ने पत्रकारिता के नए दरवाजे खोले हैं, लेकिन इन दरवाजों से विश्वसनीयता भी साथ आनी चाहिए। हजारीबाग की पत्रकारिता की पुरानी परंपरा हमें यही सिखाती है कि खबर जल्दी देने से ज्यादा जरूरी है सही खबर देना। आज हजारीबाग में करीब एक दर्जन हिंदी समाचार पत्रों के कार्यालय हैं। सैकड़ों पत्रकार अलग-अलग माध्यमों से हिंदी पत्रकारिता को अपनी सेवाएं दे रहे हैं। युवा पत्रकार डिजिटल माध्यमों में नए प्रयोग कर रहे हैं। माध्यम बदल गए हैं, लेकिन हजारीबाग की पत्रकारिता की आत्मा वही है जनता की आवाज को शब्द देना। आज जब हम हिंदी दिवस मना रहे हैं, तब हमें केवल हिंदी को बोलने और लिखने की भाषा के रूप में नहीं देखना चाहिए। हिंदी हमारे लिए अभिव्यक्ति, संवाद और लोकचेतना की भाषा भी है। हजारीबाग की पत्रकारिता ने हिंदी को केवल अक्षरों में नहीं जिया है। उसने इसे संघर्ष में, सवालों में, व्यंग्य में, संपादकीय में, ग्रामीण संवाददाता की खबर में और उस पाठक के भरोसे में जिया है जो सप्ताह भर अखबार का इंतजार करता था। आज डिजिटल युग में खबर सेकेंडों में दुनिया के एक छोर से दूसरे छोर तक पहुंच जाती है। लेकिन उस दौर को याद रखना जरूरी है जब एक छोटी-सी खबर को अखबार तक पहुंचाने में पूरा दिन लग जाता था और एक साप्ताहिक अखबार के प्रकाशन के लिए संपादक और पत्रकारों को तमाम चुनौतियों से गुजरना पड़ता था। हजारीबाग की पत्रकारिता की यह यात्रा केअखबारों की यात्रा के साथ समाज के जागने की यात्रा है। यह कलम के संघर्ष की यात्रा है। यह उन पत्रकारों की यात्रा है जिन्होंने सीमित साधनों के बावजूद शब्दों की ताकत को जिंदा रखा और शायद यही हिंदी दिवस का सबसे बड़ा संदेश भी है कि भाषा तभी जीवित रहती है, जब उसमें समाज की धड़कन सुनाई देती है। पत्रकारिता तभी सार्थक होती है, जब उसकी कलम में जनता की आवाज सुनाई देती है। हजारीबाग की हिंदी पत्रकारिता ने इस कसौटी पर अपनी एक अलग पहचान बनाई है। कल भी, आज भी और आने वाले कल में भी हमें अपने राष्ट्रभाषा हिंदी पर गर्व था, गर्व है और गर्व रहेगा ।


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