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केरेडारी में धरना की आड़ में ‘वसूली तंत्र’ का आरोप, पुलिस मौन सरकार के लिए बढ़ती चुनौती।

केरेडारी में धरना की आड़ में ‘वसूली तंत्र’ का आरोप, पुलिस मौन सरकार के लिए बढ़ती चुनौती। केरेडारी हजारीबाग  केरेडारी क्षेत्र में हाल के दिनो...

केरेडारी में धरना की आड़ में ‘वसूली तंत्र’ का आरोप, पुलिस मौन सरकार के लिए बढ़ती चुनौती।


केरेडारी हजारीबाग 


केरेडारी क्षेत्र में हाल के दिनों में धरना–प्रदर्शन की घटनाएँ तेजी से बढ़ी हैं। स्थानीय स्तर पर यह चर्चा तेज है कि कई विरोध कार्यक्रम अब जनसमस्याओं से अधिक कंपनियों पर दबाव बनाने का माध्यम बनते जा रहे हैं। इस पूरे मामले पर पुलिस की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि अब तक प्रशासनिक स्तर पर कोई ठोस पहल सामने नहीं आई है और पुलिस फिलहाल मौन नजर आ रही है। हाल ही में एक पत्र के माध्यम से कुछ ग्रामीणों ने धूल प्रदूषण, कोयला परिवहन और अन्य समस्याओं को लेकर अनिश्चितकालीन धरने की घोषणा की है। इस समाचार के साथ ऐसे ही एक पत्र की प्रति भी संलग्न की जा रही है, जिसे महिला संगठन मोर्चा समिति, बंगवारी के नाम से दिया गया है। पत्र में काजल कुमारी और फुलमती कुमारी के नाम का उल्लेख है। पत्र में धरना दे रही महिलाओं को सुरक्षा देने तथा जिन लोगों के खिलाफ मामले दर्ज हैं, उन्हें वापस लेने की मांग की गई है। इधर क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि कई बार नौकरी, प्रदूषण मुआवजा या स्थानीय अधिकारों के नाम पर कंपनियों के खिलाफ आंदोलन खड़े किए जाते हैं। आरोप है कि इन आंदोलनों के जरिए कंपनियों पर दबाव बनाकर आर्थिक लाभ लेने की कोशिश भी की जाती है। स्थानीय लोगों के अनुसार यह तरीका धीरे-धीरे नई तरह की ‘हफ्ता वसूली’ का रूप लेता जा रहा है। सूत्रों के अनुसार, हाल ही में हुए ऐसे असामाजिक और ब्लैकमेलिंग प्रवृत्ति वाले आंदोलनों की वजह से प्रतिदिन करोड़ों रुपये के राजस्व की हानि झारखंड राज्य तथा केंद्र सरकार को निरंतर हो रही है। इससे क्षेत्र की औद्योगिक गतिविधियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। कुछ लोगों का यह भी दावा है कि ऐसे आंदोलनों के पीछे सक्रिय कुछ तत्व कोयला चोरी जैसी अवैध गतिविधियों से भी जुड़े हो सकते हैं। हालांकि हाल के दिनों में केरेडारी कोयला खनन परियोजना में सीआईएसएफ (CISF) की तैनाती को एक सकारात्मक कदम माना जा रहा है, जिससे कोयला चोरी पर रोक लगाने की दिशा में प्रभावी पहल देखने को मिली है।विशेषज्ञों का कहना है कि औद्योगिक क्षेत्रों में स्थानीय समस्याओं का समाधान संवाद और प्रशासनिक हस्तक्षेप से होना चाहिए। लेकिन यदि आंदोलन ब्लैकमेलिंग और दबाव की राजनीति में बदल जाएँ, तो यह कानून-व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है। ऐसे में यह आवश्यक है कि राज्य सरकार और जिला प्रशासन इन घटनाओं पर कड़ी नजर रखें और यह सुनिश्चित करें कि वास्तविक समस्याओं का समाधान हो, साथ ही किसी भी प्रकार की अवैध वसूली या कानून व्यवस्था को प्रभावित करने वाली गतिविधियों पर समय रहते कार्रवाई हो।

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