प्रयागराज *पत्रकार विजय कुमार मिश्राकी रिपोर्ट* 🟥 *“प्रयागराज में ‘कागजों पर जिंदा’ तालाब, जमीनी हकीकत में पक्की कॉलोनियां: खतौनी 434 का ती...
प्रयागराज
*पत्रकार विजय कुमार मिश्राकी रिपोर्ट*
🟥 *“प्रयागराज में ‘कागजों पर जिंदा’ तालाब, जमीनी हकीकत में पक्की कॉलोनियां: खतौनी 434 का तीन बीघे का सरकारी जलस्रोत पूरी तरह कब्जे में गौवंश प्यास से बेहाल, लेखपाल-कानूनगो पर संरक्षण के आरोपों से घिरा सिस्टम”*
प्रयागराज। जनपद के ग्रामीण क्षेत्रों में जलसंकट अब केवल प्राकृतिक समस्या नहीं रह गया है, बल्कि यह प्रशासनिक लापरवाही और कथित मिलीभगत का गंभीर उदाहरण बनकर सामने आ रहा है।

यमुनानगर क्षेत्र, करछना तहसील, कौंधियारा ब्लॉक, बारा तहसील और आसपास के गांवों में जहां एक ओर गौवंश प्यास से सड़कों पर भटक रहा है, वहीं दूसरी ओर सरकारी रिकॉर्ड में मौजूद तालाब जमीनी स्तर पर पूरी तरह गायब हो चुके हैं। सबसे चौंकाने वाला मामला ग्राम पंचायत सोढीया से सामने आया है, जहां खतौनी संख्या 434 में दर्ज लगभग तीन बीघे का सरकारी तालाब अब केवल कागजों में ही जीवित बताया जा रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि जमीन पर इस तालाब का अस्तित्व पूरी तरह समाप्त हो चुका है और वहां पक्के मकान बनाकर पूरी कॉलोनी विकसित कर दी गई है। ग्रामीणों के अनुसार, तालाब की “एक इंच जमीन भी खाली नहीं बची” है। जिस स्थान पर कभी जलस्रोत हुआ करता था, आज वहां पक्के निर्माण खड़े हैं। इस अवैध कब्जे में अनूप, योगेंद्र, वीरेन्द्रनाथ, राजेंद्र उर्फ मूसे, नरेन्द्र, पवन, नक्कू, दिलीप और देवेन्द्र जैसे दबंगों के नाम प्रमुख रूप से सामने आ रहे हैं। मामले को और गंभीर बनाते हुए स्थानीय स्तर पर यह आरोप भी लगाए जा रहे हैं कि लेखपाल अजय पांडेय और संबंधित कानूनगो की भूमिका संदिग्ध रही है, और कथित रूप से उनकी मिलीभगत से ही इस सरकारी तालाब पर कब्जा कर पक्की कॉलोनी बसाई गई। यह भी चर्चा है कि धन उगाही के बाद अवैध निर्माण को संरक्षण दिया गया जबकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि हो गई है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब सरकारी तालाब, जो पशुओं और ग्रामीणों के लिए जीवनदायिनी भूमिका निभाता था, उसे पूरी तरह खत्म कर दिया जाएगा, तो फिर जलसंकट क्यों नहीं बढ़ेगा? यही कारण है कि आज क्षेत्र में गौवंश पानी की तलाश में सड़कों, बाजारों और हाईवे पर भटकने को मजबूर है।
क्षेत्र के अन्य गांवों में भी स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। कई तालाब सूख चुके हैं, कुछ अतिक्रमण की चपेट में हैं और जो बचे हैं, उनमें पानी नहीं है। नतीजतन, जलस्रोतों की कमी का सीधा असर पशुओं और ग्रामीणों दोनों पर पड़ रहा है। गौशालाओं की स्थिति भी सवालों के घेरे में है। सरकारी स्तर पर बेहतर व्यवस्था के दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर बड़ी संख्या में गौवंश खुले में भटकता दिखाई देता है। इससे यह संकेत मिलता है कि व्यवस्थाएं या तो कमजोर हैं या फिर केवल कागजों तक सीमित हैं। यह पूरा मामला अब केवल जलसंकट का नहीं, बल्कि सरकारी संपत्ति की सुरक्षा, प्रशासनिक जवाबदेही और भ्रष्टाचार के आरोपों से जुड़ा एक गंभीर मुद्दा बन चुका है। अब जरूरी है कि प्रशासन तत्काल और सख्त कदम उठाए: खतौनी 434 के सरकारी तालाब को चिन्हित कर कब्जामुक्त कराया जाए अवैध कॉलोनी और निर्माण पर कार्रवाई हो संबंधित राजस्व कर्मियों की भूमिका की निष्पक्ष जांच कराई जाए क्षेत्र के सभी तालाबों और जलस्रोतों का पुनर्जीवन सुनिश्चित किया जाए और गौवंश के लिए पानी व आश्रय की तत्काल व्यवस्था की जाए आज प्रयागराज के बारा और आसपास के क्षेत्रों में जो स्थिति दिखाई दे रही है, वह केवल प्यास से तड़पते पशुओं की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस सिस्टम की हकीकत है जहां तालाब कागजों में जिंदा हैं और जमीन पर खत्म हो चुके हैं।
अब देखना यह है कि यह खुलासा प्रशासन को कार्रवाई के लिए मजबूर करता है या फिर यह मामला भी अन्य शिकायतों की तरह फाइलों में ही दबकर रह जाता है।
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