जहां राज्यपाल ने देखी थी विकास की तस्वीर, दो साल बाद वहां कोयला माफियाओं कब्जा रोजगार के अभाव में अवैध कोयला कारोबार के दलदल में फसते जा रहे...
जहां राज्यपाल ने देखी थी विकास की तस्वीर, दो साल बाद वहां कोयला माफियाओं कब्जा
रोजगार के अभाव में अवैध कोयला कारोबार के दलदल में फसते जा रहे है युवा
चरही/हजारीबाग
बालदेव शर्मा
चरही (हजारीबाग)। हजारीबाग जिला प्रशासन और पुलिस-प्रशासन की कार्यशैली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। जिस इलाके को विकास की राह दिखाने का वादा किया गया था, आज वही इलाका अवैध कोयला कारोबार और माफियाओं के कब्जे में जाता दिख रहा है। 27 मार्च 2023 को महामहिम राज्यपाल सी. पी. राधाकृष्णन चुरचू प्रखंड के बहेरा पंचायत भवन पहुँचे थे। उस समय ग्रामीणों के बीच उन्होंने बहेरा–बोदरा मार्ग का निर्माण पीएम ग्राम सड़क योजना से कराने का आश्वासन दिया था। महिला समितियों को एक करोड़ रुपये का चेक भी सौंपा गया था और विकास की राह पर आगे बढ़ने का संदेश दिया गया था।
लेकिन आज उसी पंचायत भवन के पीछे पर्दा डालकर अवैध कोयले का विशाल डिपो खड़ा कर दिया गया है। जिस सड़क पर राज्यपाल ने विकास की गाड़ियाँ दौड़ाने की बात कही थी, उस पर अब अवैध कोयले से लदे ट्रक बेधड़क दौड़ रहे हैं।
राज्यपाल के दौरे के वक्त जिस “विकास की तस्वीर” को अधिकारियों ने चमका कर पेश किया था, उसकी असलियत बिल्कुल उलट है।
गांव-गांव में बेरोजगार युवा वैकल्पिक रोजगार न मिलने के कारण मजबूरीवश अवैध खदानों और कोयला ढुलाई में जुट गए हैं।
चरही थाना क्षेत्र के बहेरा पंचायत भवन के पीछे, इंदरा पंचायत के करमाबेड़ा में ऐसे अवैध बने डीपीओ को देखा जा सकता है। दिन में साइकिल और मोटरसाइकिल से बोरे में भरकर कोयला जमा किया जाता है और रात में जेसीबी से हाईवा व ट्रकों में भरकर आसपास की स्पंज फैक्ट्रियों व बनारस–डेहरी की मंडियों तक भेजा जाता है। कमोबेश यही हाल चुरचू, आगो, टाटीझरिया थाने का भी है।
प्रशासन की योजनाएँ फेल, मजबूरन जान जोखिम में डालकर कर रहे है अवैध कारोबार
झारखंड सरकार ने ग्रामीण आजीविका बढ़ाने और युवाओं को रोजगार देने के लिए कई योजनाएँ चलाईं — बिरसा हरित ग्राम योजना, पोटो हो हो खेल विकास योजना, मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना, मुख्यमंत्री पाशुपालन योजना, बंधु योजना, मनरेगा जैसी पहलें कागजों में तो दिखती हैं, लेकिन जमीन पर इनकी गूंज नहीं सुनाई देती। चरही और आसपास के पंचायतों में न तो स्वरोजगार की ट्रेनिंग कैंप्स का असर दिखा और न ही स्वरोजगार लोन योजनाओं का लाभ युवाओं तक पहुंच पाया। नतीजतन, आज बड़ी संख्या में युवा और परिवार अवैध कोयला कारोबार में अपनी जिंदगी दांव पर लगा रहे हैं।
थाना प्रभारी की कार्यशैली पर सवाल
चरही थाना क्षेत्र में कानून-व्यवस्था की स्थिति भी चिंताजनक है। ग्रामीणों और स्थानीय लोगों का आरोप है कि थाना प्रभारी को बार-बार फोन करने के बावजूद वे कॉल रिसीव नहीं करते। वारंटी और आरोपित थाने में आकर आराम से मुलाकात करके निकल जाते हैं, जबकि आम जनता को छोटे-छोटे कामों के लिए घंटों बैठना पड़ता है। थाने में सुबह-शाम दलालों और अवैध कारोबारियों का जमावड़ा आम बात हो गई है।
इलाके में सक्रिय कोयला माफियाओं का नेटवर्क इतना मजबूत है कि प्रशासन की नाक के नीचे अवैध खदानें धड़ल्ले से चल रही हैं। कई जगह ग्रामीण खुद बताते हैं कि सीसीएल के खदानों के आसपास सुरक्षा व्यवस्था या तो नदारद है या फिर स्थानीय स्तर पर मिलीभगत से खानापूर्ति की जाती है। सवाल यह है कि जब इतने बड़े पैमाने पर रोजाना कोयले की निकासी हो रही है, तो जिला प्रशासन और पुलिस-प्रशासन की आंखें कैसे मूंदी रह जाती हैं।
गांव के कई लोग नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं कि प्रशासनिक संरक्षण के बिना इतना बड़ा नेटवर्क चल पाना संभव ही नहीं है। वे कहते हैं कि जब भी कोई ग्रामीण शिकायत करता है, उसे ही पुलिस-प्रशासन परेशान करने लगता है। ऐसे हालात में लोग खामोश रहना ही बेहतर समझते हैं। प्रखंड के जनप्रतिनिधि भी कुछ बोलने से बचते है। बड़ा सवाल यह है कि आखिर जिला प्रशासन और पुलिस इस अंधेरे कारोबार पर कब कार्रवाई करेगी? क्या सरकार की योजनाएँ केवल कागजों और रिपोर्टों तक ही सीमित रहेंगी? और क्या चरही और चुरचू प्रखंड के लोग कभी वैकल्पिक रोजगार और सुरक्षित जीवन की राह देख पाएंगे।


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