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प्रयागराज क्रॉनिक बीमारियों के खिलाफ पहली पंक्ति की रक्षक होम्योपैथNews

 * क्रॉनिक बीमारियों के खिलाफ पहली पंक्ति की रक्षक होम्योपैथ*                 विश्व होम्योपैथी दिवस पर, प्रयागराज करेली निवासी प्रसिद्ध चिक...



 *क्रॉनिक बीमारियों के खिलाफ पहली पंक्ति की रक्षक होम्योपैथ*                

विश्व होम्योपैथी दिवस पर, प्रयागराज करेली निवासी प्रसिद्ध चिकित्सक नैनो होम्योपैथी इंस्टीट्यूट ऑफ रिसर्च एंड वेलफेयर की संस्थापक और निदेशक लखनऊ डॉ. लुबना कमाल ने अनुभव साझा करते हुए मीडिया को साक्षात्कार में बताया कि यह समग्र पद्धति कैसे किडनी केयर में क्रांति ला रही है और चिकित्सा मान्यताओं को चुनौती दे रही है। दुनिया भर में जब क्रॉनिक बीमारियाँ चिंताजनक दर से बढ़ रही हैं, ऐसे में स्वास्थ्य देखभाल के नवाचारी दृष्टिकोण पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो गए हैं। इस चिकित्सीय क्रांति की अगुवाई कर रही हैं—एक ऐसी क्रांति जो होम्योपैथी के माध्यम से शरीर की प्राकृतिक हीलिंग क्षमताओं को जागृत करती है। अब तक 20,000 से अधिक किडनी फेल्योर रोगियों का वैश्विक स्तर पर इलाज कर चुकीं डॉ. कमाल का कार्य क्रॉनिक बीमारियों के प्रबंधन की पारंपरिक सोच को चुनौती देता है, विशेषकर किडनी फेल्योर जैसी स्थितियों में जहाँ डायलिसिस और ट्रांसप्लांट के अलावा और कोई विकल्प सामान्यतः नहीं माना जाता।होम्योपैथी के पीछे का विज्ञान हैं, होम्योपैथी व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक स्तर को ध्यान में रखते हुए रोग की जड़ पर कार्य करती है, डॉ. कमाल समझाती हैं। पारंपरिक चिकित्सा जहाँ लक्षणों को दबाने पर केंद्रित होती है, वहीं होम्योपैथी अल्ट्रा-डायल्यूटेड औषधियों के माध्यम से शरीर की आत्म-नियामक प्रणालियों को सशक्त करती है।*
डॉ कमाल नें बताया कि यह पद्धति तीन मूल सिद्धांतों पर आधारित है.समान से समान का इलाज अर्थात जो पदार्थ बड़े मात्रा में लक्षण उत्पन्न करते हैं, वे ही सूक्ष्म मात्रा में उन्हीं लक्षणों का इलाज कर सकते हैं,न्यूनतम मात्रा औषधियाँ इतनी पतली होती हैं कि उनमें विषाक्तता नहीं होती लेकिन चिकित्सीय प्रभाव बना रहता है,व्यक्तिकृत चिकित्सा हर मरीज की प्रकृति के अनुसार दवा का चयन। डॉ. कमाल कहती हैं जैसे टीकाकरण में मृत या कमजोर कीटाणु शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को सक्रिय करते हैं, वैसे ही होम्योपैथी की औषधियाँ शरीर को प्राकृतिक रूप से रोग से लड़ने के लिए प्रोत्साहित करती हैं। पूरक चिकित्सा के रूप में भूमिका बढ़ रहा हैं,होम्योपैथी को लेकर एक आम भ्रांति है कि यह एलोपैथिक उपचार के साथ नहीं ली जा सकती। डॉ. कमाल इस मिथक को दूर करते हुए बताया कि हम अक्सर एलोपैथी के साथ मिलकर काम करते हैं। किडनी रोग, लिवर सिरोसिस या कैंसर जैसे क्रॉनिक मामलों में हम मरीजों को जरूरी एलोपैथिक इलाज के साथ-साथ होम्योपैथी लेने की सलाह देते हैं ताकि साइड इफेक्ट्स कम हों और परिणाम बेहतर हों। यह समन्वित दृष्टिकोण विशेष रूप से उन रोगों में उपयोगी है जहाँ पारंपरिक विकल्प सीमित या नुकसानदायक हो सकते हैं। डॉ. कमाल के अनुसार, होम्योपैथी को कई रोगों के लिए प्रारंभिक उपचार के रूप में अपनाना चाहिए, विशेष रूप से बुखार, सर्दी-जुकाम, खांसी और छोटी-मोटी चोटों जैसी तीव्र स्थितियों में।इन तुच्छ बीमारियों का दर्द निवारक दवाओं, एंटीबायोटिक्स, स्टेरॉयड आदि से दमन करने से जटिल रोग उत्पन्न हो जाते हैं। उनके क्लिनिकल अनुभवों से चौंकाने वाली प्रवृत्तियाँ सामने आई हैं,ज्यादातर किडनी फेल्योर रोगियों का इतिहास दर्द निवारक दवाओं के अत्यधिक उपयोग का होता है।नेफ्रोटिक सिंड्रोम से पीड़ित बच्चों को यह रोग सर्दी-जुकाम या वायरल बुखार के गलत इलाज के बाद हुआ। एलर्जी के अधिकांश मामलों की जड़ में टीकाकरण या त्वचा रोगों का दमन होता है। इस समस्या से निपटने के लिए उनके संस्थान ने होमियोफर्स्ट नामक एक होम्योपैथिक फर्स्ट ऐड किट विकसित की है जो सामान्य बीमारियों के लिए डॉक्टर की पर्ची के बिना भी सुरक्षित रूप से उपयोग की जा सकती है।
किडनी रोग में होम्योपैथी के सफलता की मिसाल डॉ. कमाल का सबसे क्रांतिकारी कार्य क्रॉनिक किडनी डिजीज (CKD) के इलाज में दिखता है, जिसे वे एक मूक महामारी बताती हैं, जो जीवनशैली विकारों, प्रदूषण, दवाओं के दुरुपयोग और जल की कमी की आदतों से प्रेरित है। होम्योपैथी न सिर्फ डायलिसिस के साथ काम कर सकती है, बल्कि कई मामलों में उसकी आवश्यकता को टाल भी सकती है, वे कहती हैं।यह रोग की प्रगति को धीमा करती है, फ्लूइड ओवरलोड को कम करती है, ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करती है और ऊर्जा के स्तर में सुधार करती है। जल्दी इलाज शुरू करने से डायलिसिस से बचाव संभव है।हालांकि होम्योपैथी संरचनात्मक क्षति को पलट नहीं सकती, लेकिन वह कार्यशीलता को बेहतर बना सकती है, संवैधानिक औषधियों, सही जीवनशैली और भावनात्मक सहयोग से हमने रोगियों की किडनी कार्यक्षमता को बेहतर होते देखा है।शोध बताते हैं कि शरीर के हर हिस्से में एडल्ट स्टेम सेल्स मौजूद होते हैं। होम्योपैथिक दवाएँ इन कोशिकाओं को सक्रिय करके मरम्मत और पुनर्जनन में मदद करती हैं। एक प्रेरणादायक केस में बिहार के एक 60 वर्षीय रोगी जो कोमा में थे, वेंटिलेटर पर थे और मल्टी-ऑर्गन फेल्योर से जूझ रहे थे.वे कुछ हफ्तों में ही जीवन शक्ति से भरकर अपने पैरों पर क्लिनिक आए, सीढ़ियाँ चढ़ते हुए। शारीरिक ही नहीं, मानसिक स्वास्थ्य में भी कारगर होम्योपैथी सिर्फ शारीरिक रोगों तक सीमित नहीं है। डॉ. कमाल बताती हैं कि यह तनाव, चिंता, अवसाद, OCD और अनिद्रा जैसी मानसिक समस्याओं में भी प्रभावी है। यह तंत्रिका तंत्र को संतुलित करती है, बिना किसी नशे की लत या साइड इफेक्ट के। इसकी सुरक्षा प्रोफ़ाइल शिशुओं, गर्भवती महिलाओं और वृद्धों के लिए भी इसे उपयुक्त बनाती है—जहाँ पारंपरिक दवाओं में कई बार प्रतिबंध होते हैं।

 संवाददाता 

       विजय कुमार मिश्रा

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